इस्लाम के स्वर्ण युग ने जिसे अनदेखा किया, उसके आज के मायने
ग्रीक ज्ञान के चयनित अनुवाद ने मुस्लिम दुनिया में विज्ञान तो पहुँचाया, पर राजनीतिक विचार और शासन का दर्शन पीछे छूट गया।
मुख्य बिंदु
- इस्लाम के स्वर्ण युग में ग्रीक चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, बीजगणित और दर्शन का अरबी में अनुवाद किया गया, लेकिन समाज, क़ानून, राजनीति और इतिहास से जुड़ी प्राचीन कृतियों को इससे बाहर रखा गया, जिनमें अरस्तू का Politics और हेरोडोटस का Histories शामिल हैं।
- इस बहिष्करण के पीछे मुख्य कारण यह विश्वास था कि समाज, क़ानून और राजनीति से जुड़ा सही दृष्टिकोण अल्लाह ने पैग़ंबर मुहम्मद पर क़ुरआन और हदीसों के माध्यम से प्रकट कर दिया था।
- राज्य, क़ानून और नागरिक समाज पर आधुनिक विचारों को धार्मिक परंपरा के सम्मान के साथ जोड़ने का सबसे व्यापक प्रयास वृहत्तर मध्य एशिया में मिलता है, ख़ासकर उज़्बेकिस्तान में।

मुस्लिम समाज आधुनिक ज्ञान को अपनाने और उसे बढ़ावा देने वाली संस्थाएँ खड़ी करने में बहुत धीमे रहे। आज कुछ समकालीन पर्यवेक्षक दावा करते हैं कि काहिरा के अल-अज़हर जैसी संस्थाएँ, जो एक हज़ार साल पुरानी हैं, इटली, फ़्रांस और इंग्लैंड के शुरुआती यूरोपीय विश्वविद्यालयों के समकक्ष हैं। लेकिन पहली किस्म की संस्थाएँ ज्ञान के एक ज्ञात भंडार को ज्यों का त्यों आगे बढ़ाने के लिए समर्पित थीं, न कि उसे अद्यतन या संशोधित करने के लिए। हमारे समय में भी इस्लामी दुनिया में कई अनुशासन काफ़ी अविकसित हैं; भौतिकी में नोबेल पुरस्कार पाने वाला सिर्फ़ एक मुसलमान रहा है। हालाँकि आज कुछ मुस्लिम देश ज्ञान के क्षेत्र में अपनी इस विकासात्मक कमी को स्वीकार करते हुए उसे दूर करने के लिए वित्तीय और मानव संसाधन दोनों लगा रहे हैं।
यह विलंबित विकास कितना आगे बढ़ेगा और ख़ुद मुस्लिम समाजों में कितनी गहराई तक पैठेगा, यह अभी अज्ञात है। लेकिन इस शैक्षिक परियोजना को तथाकथित “मुस्लिम स्वर्ण युग” — लगभग 800 से 1200 तक — के महान वैज्ञानिकों की पुनर्खोज से बहुत प्रोत्साहन मिला है। बीरूनी जैसी हस्तियाँ, जिन्होंने पृथ्वी का माप सत्रहवीं सदी तक के किसी भी यूरोपीय से ज़्यादा सटीक तरीक़े से किया; अल-ख़्वारिज़्मी, जिन्होंने बीजगणित के क्षेत्र का पुनराविष्कार किया और जिनके नाम से हमारा शब्द “एल्गोरिद्म” बना; और इब्न अल-हैथम, जिन्होंने प्रकाशिकी के क्षेत्र का आविष्कार किया — ये सभी पुनर्जागरण तक के अपने ईसाई समकालीनों से कहीं आगे थे।
प्रतिभा के इस पहले अनदेखे युग की पुनर्खोज मुख्यतः पश्चिमी शोधकर्ताओं का काम रही है, लेकिन अब मुस्लिम विद्वान भी पूरी तरह इसमें शामिल हो गए हैं। नवप्रवर्तकों के इस विविध समूह की पुनर्खोज मुस्लिम समाजों के अधिकारियों, शिक्षाविदों और उद्यमियों के लिए मानो टॉनिक साबित हुई है। इसने शून्य से कुछ नया रचने की चुनौती को पुनर्खोज की एक प्रक्रिया में बदल दिया है, जिसका केंद्र उनका अपना इतिहास और संस्कृति है। इससे, बदले में, मुस्लिम विज्ञान और चिंतन के उस स्वर्ण युग की उत्पत्ति पर मूल्यवान शोध हुए हैं।
आधुनिक शोध ने दिखाया है कि मध्यकालीन इस्लामी दुनिया में प्राचीन ग्रीक चिंतन की श्रेष्ठ कृतियों के अरबी अनुवादों के प्रवेश ने इस्लामी दुनिया के आरंभिक बौद्धिक जीवन को कैसे तेज़ी से ऊर्जा दी। पेरिक्लीज़ के युग की शास्त्रीय ग्रीक कृतियों के इन अनेक अनुवादों के बिना मुस्लिम बौद्धिक जीवन का स्वर्ण युग आता ही नहीं। अनुवाद तो कई लेखकों के हुए, लेकिन सबसे आगे अरस्तू की कृतियाँ रहीं। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के प्लेटो के इस शिष्य और सिकंदर महान के इस शिक्षक ने ही सबसे बढ़कर एक हज़ार साल पहले मुस्लिम बौद्धिक पुनर्जागरण की चिंगारी जलाई।
हालाँकि अनुवाद अन्यत्र भी हुए, अनुवाद आंदोलन का भौगोलिक केंद्र नई-नवेली नियोजित नगरी बग़दाद थी, जिसकी स्थापना 762 ईस्वी में हुई थी। अनुवाद इसलिए अनिवार्य थे क्योंकि ग्रीक जानने वाले मुस्लिम राजनेताओं और धर्मगुरुओं की गिनती एक हाथ की उँगलियों पर की जा सकती थी। लेकिन अनुवादक मिलते कहाँ? भूमध्यसागरीय दुनिया में एक ही समूह ऐसा था, जो ग्रीक और अरबी दोनों जानता था, साथ ही अपनी ख़ुद की सिरियाक भाषा (एक अरामी भाषा) भी—वे थे सीरियाई ईसाई। पूरे क्षेत्र में फैले बिशप-क्षेत्रों के ज़रिये सीरियाई लोग इस्लाम की दुनिया के घटनाक्रम से भलीभाँति परिचित थे। जब अब्बासी ख़लीफ़ा अल-मंसूर (774–775) ने बग़दाद में एक पुस्तकालय स्थापित किया, जो आगे चलकर “ज्ञान का घर” (House of Wisdom) कहलाया, तो उन्होंने अतीत की प्रमुख कृतियों के अरबी अनुवादों से उसे सुसज्जित करने की इच्छा जताई। सीरियाई ईसाइयों ने प्राचीन ग्रीक ग्रंथों के अनुवाद उपलब्ध कराने का यह अवसर लपक लिया। कई तो मूल्यवान पांडुलिपियाँ बटोरने के लिए कुस्तुंतुनिया तक गए, यह जानते हुए कि नए पुस्तकालय के हितैषी उन्हें इस्लाम की कामकाजी भाषा अरबी में अनुवाद के लिए अच्छी-ख़ासी रक़म देंगे।
प्राचीन ग्रीक विचारकों की कौन-सी कृतियाँ अनूदित हुईं? कई अनुवाद लुप्त हो चुके हैं, लेकिन जिन अनेक के बारे में हम जानते हैं, उनमें लगभग सभी चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, बीजगणित और दर्शन के क्षेत्रों में थे। बाक़ी सब कुछ अनुवाद से और इसलिए इस्लाम के महानतम मस्तिष्कों की जानकारी से बाहर रहा। प्राचीन ग्रीक विचारकों की कौन-सी सबसे महत्वपूर्ण कृतियाँ अरबी में अनूदित नहीं हुईं? यहीं कहानी पेचीदा होती है। बग़दाद के नए मुस्लिम शासकों और बुद्धिजीवी वर्ग की बौद्धिक जिज्ञासा की प्रशंसा करते हुए हाल के विद्वान उन कृतियों का उल्लेख नहीं करते, जो कभी अनूदित ही नहीं हुईं और इसलिए जिनका मुस्लिम मानस पर कोई असर नहीं पड़ा। यह चूक, कम से कम, दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि इस्लाम के स्वर्ण युग के बारे में हम उतना ही उससे सीख सकते हैं जो अनूदित नहीं हुआ, जितना उससे जो हुआ।
उपेक्षित कृतियों की सूची लंबी और प्रभावशाली है। हैरानी की बात है कि इस salon des refusés में सबसे प्रमुख प्राचीन दुनिया के समाज, क़ानून, राजनीति और इतिहास पर सबसे बड़े विचारक थे। दूसरे शब्दों में, नगरों, राज्यों और समूचे समाजों के संचालन और शासन से जुड़ी हर चीज़ अरबों के अन्यथा जिज्ञासु मस्तिष्कों से बाहर रह गई। इस तरह हेरोडोटस का Histories, जो भौगोलिक विवरणों से इतना समृद्ध है और पूर्व की विविध संस्कृतियों के तीखे वर्णनों से भरा है, कभी अनूदित नहीं हुआ। इसी तरह थ्यूसिडाइडीज़ का History of the Peloponnesian War, जो एथेंस और स्पार्टा के बीच लंबे गृहयुद्ध और प्रतिद्वंद्वी पक्षों की आंतरिक गतिकी का एक शानदार विश्लेषण है, उसे भी कोई अनुवादक नहीं मिला।
इससे भी गंभीर है अरस्तू के Politics के अरबी अनुवाद का अभाव, जो यक़ीनन प्राचीन दुनिया का सबसे गहन विश्लेषण है कि राजनीतिक निर्णय वास्तव में किन विविध तरीक़ों से लिए जाते हैं—शासकों और उनके चाटुकारों के दावों के विपरीत। हमारे शब्द “राजनीति” का स्रोत होने के अलावा यह कृति नीतिशास्त्र से आगे जाती है, जिसे अरस्तू केवल व्यक्तियों से तथा समूचे समुदायों के नियमों और व्यवहारों से संबंधित मानते थे। जहाँ प्लेटो का Republic अमूर्त आधारभूत सिद्धांतों से चलता है और बादलों में ही रहता है, वहीं अरस्तू का Politics वास्तविक क्षेत्रीय शोध पर आधारित था, जिसके तहत उन्होंने 158 नागरिक संविधान जुटाए। इनका अध्ययन करते हुए अरस्तू पूछते हैं “क्या काम करता है?” न कि “क्या काम करना चाहिए?” अरस्तू का ध्यान मानवीय कर्तृत्व पर था। ग्रीस के प्रतिभा-युग की जिन कृतियों की अरबों ने उपेक्षा की, उनकी सूची राजनीति और क़ानून के मील के पत्थर जैसे अध्ययनों से आगे तक जाती है। उन अनेक शास्त्रीय ग्रंथों को भी ठुकरा दिया गया, जो मानव स्वभाव को वैसा प्रस्तुत करते थे जैसा वह वास्तव में है, न कि जैसा उसे होना चाहिए। ऐसी कृतियों में सबसे पहले त्रासदियाँ थीं। एस्किलस, सोफ़ोक्लीज़ और यूरिपिडीज़ के सैकड़ों नाटकों में से एक भी अरबी में अनूदित नहीं हुआ, जिससे मुस्लिम दुनिया मानवीय मामलों में त्रासदी की अवधारणा की समझ से ही वंचित रह गई।
शायद यह कोई आश्चर्य नहीं कि बग़दाद के पाखंडी-पवित्रतावादी नए शासकों ने हास्य के जनक अरिस्तोफ़ेनीज़ की तीखी और ज़बरदस्त हँसी जगाने वाली कॉमेडियों के अनुवाद करवाने की कोई कोशिश नहीं की। Lysistrata और The Frogs अरबी बोलने वालों के लिए अनजान रहने से बग़दाद और मुस्लिम दुनिया में अन्यत्र के श्रोताओं को ग्रीकों की उस क्षमता का कभी परिचय नहीं मिला कि वे अल्सिबियाडीज़ जैसे उन्नत नेताओं, यूरिपिडीज़ जैसी सम्मानित सांस्कृतिक हस्तियों, और यहाँ तक कि पेलोपोनेशियाई युद्धों जैसी गंभीर राष्ट्रीय घटनाओं का भी मज़ाक़ उड़ा सकते थे। कुछ ग्रीक कॉमेडियाँ निस्संदेह गंभीर मुस्लिम नेताओं के लिए बहुत अश्लील रही होंगी। पर क्या उन्होंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि ग्रीकों की तीक्ष्ण बुद्धि, मनोरंजक व्यंग्य और पैरोडी का निर्भीक इस्तेमाल ख़ुद उनके लिए संभावित ख़तरा है? इन कृतियों का अनुवाद न करने का निर्णय जिसने भी लिया, उसने मुस्लिम दुनिया को इस बात के नमूनों से वंचित कर दिया कि सभ्य लोग अपने शासकों पर और ख़ुद पर कैसे हँस सकते हैं।
ये चुनाव किसने किए? यह सवाल तनिक भी मामूली नहीं है। चूँकि अरस्तू की इतनी सारी दूसरी कृतियाँ अरबी तक पहुँच गईं, इसलिए यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या दूसरी श्रेष्ठ कृतियाँ इसलिए बाहर रह गईं कि अनुवादक—किसी भी कारण से—उन्हें बग़दाद के नए पुस्तकालय के धनी संरक्षकों के सामने पेश नहीं कर पाए? या इसलिए कि ख़लीफ़ा के अपने पुस्तकालयाध्यक्षों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें न ख़रीदने का फ़ैसला किया? यदि पहला कारण है, तो क्या अनुवादकों ने यह तय किया कि वे राजनीति, क़ानून, इतिहास पर प्राचीन ग्रीक कृतियों तथा त्रासदियों और कॉमेडियों को जुटाकर अपने बग़दादी संरक्षकों को अनुवाद के लिए प्रस्तावित ही न करें? यह संभव है, लेकिन असंभाव्य, क्योंकि अनुवाद का उद्यम अपने ढंग से एक बाज़ार-संबंध था, जिसमें विक्रेता संभावित माल ख़रीदारों के सामने रखते थे और ख़रीदार अपनी पसंद और जेब के हिसाब से प्रतिक्रिया देते थे। या फिर, वैकल्पिक रूप से, क्या ऐसा इसलिए था कि ख़ुद बाइज़ेंटाइनों ने अरस्तू के Politics और राजनीतिक संस्कृति तथा समाज पर अन्य ग्रीक कृतियों का सुराग़ खो दिया था और बिचौलिए उन्हें ढूँढ़ ही न सके? लेकिन यह सच होते हुए भी कि, जैसा एक हालिया विद्वान ने तर्क दिया है, “Aristotle’s Politics was the least popular of his major works in Byzantium,” [*] वह वहाँ निश्चित रूप से ज्ञात था और बग़दाद से जुड़े किसी भी उत्सुक और मुनाफ़ा-केंद्रित शोधकर्ता की पहुँच में होता।
ये कारण काम में आए या नहीं और कैसे आए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम ख़िलाफ़त के अब्बासी शासकों और बग़दाद में उनके बौद्धिक सहयोगियों ने अरस्तू के Politics या हेरोडोटस के Histories की प्रतियाँ हासिल करने और उनका अनुवाद कराने की कोई स्पष्ट कोशिश नहीं की, एस्किलस की त्रासदियों और अरिस्तोफ़ेनीज़ की कॉमेडियों की तो बात ही छोड़िए। उन्होंने स्पष्टतः यह निष्कर्ष निकाला कि बग़दाद और उससे परे के मुस्लिम पाठक-वर्ग को राजनीति और मानव समाज की कमज़ोरियों पर ग्रीक अंतर्दृष्टियों की कोई ज़रूरत नहीं है—इन सबको उनकी नई राजधानी बग़दाद के मुस्लिम पाठक-वर्ग और जिस नई मुस्लिम विश्व-व्यवस्था को वे क़ायम रखने का प्रयास कर रहे थे, उसके लिए अप्रासंगिक, यहाँ तक कि असंगत माना गया।
यह कहना उचित होगा कि ग्रीक त्रासदियाँ और कॉमेडियाँ मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप या बाइज़ेंटियम में भी पसंद नहीं की गईं। लेकिन भले ही उन्होंने उनके गहरे निहितार्थों को अनदेखा करना चुना हो, बग़दाद के मुसलमानों के इन समकालीनों के पास कम से कम कुछ ग्रंथों तक पहुँच तो थी। और इससे भी बड़ी बात यह कि इतिहास, क़ानून और व्यावहारिक राजनीति पर प्राचीन लेखन उन्हें रोमन लेखकों की अनेक जीवित कृतियों को पढ़ने के ज़रिये अच्छी तरह ज्ञात था। लैटिन दुनिया के विचारक भलीभाँति जानते थे कि सिसरो, सैलस्ट और सीज़र जैसे इतिहासकार और विश्लेषक ईसाई-पूर्व युगों के बारे में लिखते थे, पर उन्होंने उन्हें धार्मिक आधार पर अस्वीकार नहीं किया। इन लैटिन क्लासिक्स को पढ़कर मध्यकालीन यूरोपीय लोगों को सभी समाजों में राजनीतिक मनुष्य के चरित्र और हर जगह तथा हर काल में मौजूद नैतिक सरोकारों और नंगी महत्वाकांक्षा के बीच टकरावों पर गहरी अंतर्दृष्टि मिली।
इसके विपरीत, 800–1200 के इस्लामी पुनर्जागरण ने प्राचीन रोम की बौद्धिक उपलब्धियों में लगभग कोई रुचि नहीं दिखाई। निस्संदेह अपवाद थे, ख़ासकर ग्रीको-रोमन चिकित्सक क्लॉडियस गैलन की प्रमुख कृतियों का अनुवाद, जो एशिया माइनर के मूल निवासी थे और जिनका चिकित्सा पर विस्तृत ग्रंथ पूरा अनूदित हुआ—पर ग्रीक मूल से, लैटिन से नहीं। रोमन विरासत से भाषा के कारण (दूरी के कारण नहीं) कटे हुए और सीरियाइयों के समकक्ष कोई लैटिन अनुवादक न होने के कारण, बग़दाद ने प्राचीन रोम में कोई रुचि नहीं दिखाई और प्लूटार्क के Parallel Lives तक का अनुवाद नहीं किया, जो ग्रीक में लिखे गए थे।
क्या मुस्लिम शासकों की सांस्कृतिक और धार्मिक सेंसरशिप सिर्फ़ प्राचीन ग्रीस और रोम पर ही केंद्रित थी? निष्पक्षता के नाते हमें यह दर्ज करना चाहिए कि मुसलमानों ने लंबे समय तक भारत की राजनीति और संस्कृति के प्रति भी वैसी ही उदासीनता, बल्कि शत्रुता दिखाई। हालाँकि ग्रीस और रोम की तरह उन्होंने भारतीय गणित की जानकारी हासिल की, जिसमें शून्य की अवधारणा का आविष्कार और गिनती की दशमलव प्रणाली शामिल है, जिसे ग़लती से “अरबी अंक” कहा जाता है। खगोलशास्त्र पर कम से कम एक भारतीय कृति का भी अनुवाद हुआ। और ग्रीक तथा रोमन समाज में मुस्लिम पूर्व की पूर्ण अरुचि के ठीक विपरीत, हिंदू भारत ने एक शानदार मुस्लिम वैज्ञानिक और विद्वान अबू रैहान अल-बीरूनी को आकर्षित किया। बीरूनी के विशाल और परिष्कृत अध्ययन India (Al-Hind) ने गणित, खगोलशास्त्र और अन्य विज्ञानों में भारतीय प्रगति के सामाजिक, राजनीतिक और यहाँ तक कि धार्मिक स्रोतों की गहराई में जाकर पड़ताल की। दुखद है कि बीरूनी के इस महान अध्ययन की काफ़ी हद तक उपेक्षा हुई, और मुस्लिम दुनिया ने प्राचीन ग्रीस या रोम के लिए कोई बीरूनी पैदा नहीं किया।
क्या बग़दाद की सांस्कृतिक सेंसरशिप का कोई समकक्ष लैटिन पश्चिम में मुस्लिम पूर्व की कृतियों की सेंसरशिप के रूप में मिलता है? पुनर्जागरण से काफ़ी पहले ही पश्चिमी विद्वानों ने उन थोड़े-से मुस्लिम लेखकों में गहरी रुचि ली थी जिनकी कृतियाँ भूमध्यसागर पार करके उन तक पहुँचीं। अरबी से लैटिन में अनुवाद 10वीं सदी के उत्तरार्ध में ही शुरू हो गया था और पुनर्जागरण से पहले की सदियों में बढ़ती तीव्रता के साथ जारी रहा। मुस्लिम दुनिया में 19वीं सदी तक ऐसी कोई समानांतर जिज्ञासा नहीं दिखती। इसकी व्याख्या ज़रूरी है। बग़दाद और मुस्लिम पूर्व ने प्राचीन ग्रीक दर्शन, तर्कशास्त्र, गणित और चिकित्सा को क्यों अपनाया, लेकिन समाजों के जीवन और राजनीति की कार्यप्रणाली पर उसकी अंतर्दृष्टियों के प्रति बंद क्यों रहे? मुस्लिम पूर्व ने कुछ क्षेत्रों में प्राचीन ज्ञान को इतनी तीव्रता से क्यों अपनाया कि वह पश्चिम से बहुत आगे निकल गया, लेकिन समाज, राजनीति और क़ानून पर भूमध्यसागरीय दुनिया की बुद्धिमत्ता के प्रति पूरी तरह बंद रहा?
दो तरह की व्याख्याएँ सामने आती हैं। पहली, जैसा हम देख चुके हैं, प्राचीन ग्रंथों तक पहुँच से जुड़े व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित है। सीरियाई बिचौलिए बग़दाद में अपने संपन्न संरक्षकों की इच्छाओं को भाँपकर उनके अनुरूप काम करना चाहते थे। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि उन्होंने बग़दाद में अपने भुगतानकर्ताओं को इन विषयों पर अनुवाद प्रस्तावित किए हों और फिर उन्हें ठुकरा दिया गया हो। न ही माँग के पक्ष में ऐसा कोई प्रमाण है कि बग़दाद के भुगतानकर्ताओं ने समाज और राजनीति पर ग्रीक या रोमन कृतियों के अनुवाद माँगे हों, लेकिन उन्हें न मिले हों।
ऐसा नहीं कि मुस्लिम दुनिया समाज, राजनीति और इतिहास की प्रकृति से जुड़े सरोकारों के प्रति बहरी थी। कई आरंभिक मुस्लिम लेखकों ने, जिनकी शुरुआत अल-फ़ाराबी से होती है—जो आज के कज़ाख़िस्तान के मूल निवासी थे—अच्छे समाज पर अंतर्दृष्टियाँ दीं। हाल के आलोचकों ने फ़ाराबी के विवेचन और प्लेटो के Republic के बीच समानताएँ नोट की हैं, जिसके अंश संभवतः नव-प्लेटोवाद के हेलेनिस्टिक संस्थापक प्लोटिनस की कृतियों में शामिल होने के कारण उन्हें ज्ञात थे। प्लेटो की तरह ही फ़ाराबी और उनके बाद के अधिकांश मुस्लिम न्यायशास्त्रियों ने एक अकेले और सर्वशक्तिमान शासक की माँग की, जो समाज के सभी क़ानूनों और नियमों का स्रोत हो और जिसकी बुद्धिमत्ता एक निष्क्रिय और अज्ञानी जनता पर उन नियमों को थोपने के उसके कठोर और अनवरत प्रयासों को न्यायोचित ठहराती हो।
ऐसे विचार आगे की सदियों में मुस्लिम न्यायशास्त्रियों की अनगिनत कृतियों के केंद्र में हैं। यह स्वीकार करने के बाद कि नागरिक और व्यक्तिगत जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर पवित्र ग्रंथ में नहीं दिया गया है, कुछ न्यायशास्त्रियों ने क़ुरआनी सिद्धांतों को उन समस्याओं पर लागू करने का प्रयास किया जो पैग़ंबर के ज़माने में मौजूद नहीं थीं। उनके बीच के मतभेदों से इस्लामी न्यायशास्त्र के वे चार स्कूल पैदा हुए, जो आज भी सुन्नी मुसलमानों के बीच मौजूद हैं, और अलग से शिया क़ानून का स्कूल भी। इनमें से केवल हनफ़ी स्कूल (जो अब भी मध्य एशिया भर में प्रचलित है) न्यायिक विवेक की गुंजाइश देता है और स्थानीय प्रथागत क़ानून को मान्यता देता है।
फ़ाराबी ने अपने प्रस्तावों का बचाव यह कहकर किया कि वे किसी भी विचारशील मस्तिष्क के लिए स्पष्ट हैं, लेकिन यह कोई संयोग नहीं कि वे क़ुरआन के आदेशों की गहरी प्रतिध्वनि थे। यह पवित्र ग्रंथ पुष्टि करता है कि मानवीय मामलों में सारा वैध अधिकार अल्लाह से आता है, जैसा उसने अपने पैग़ंबर मोहम्मद पर प्रकट किया, और जिसे पैग़ंबर के बाद के कथनों से पूरक बनाया गया, जो उनकी विशाल “उक्तियों” या हदीसों में संकलित हैं। पवित्र ग्रंथ के इस समुच्चय को समाज पर लागू करना एक अकेले और सर्वशक्तिमान नेता का कार्य है, और समाज का कार्य इस अधिकार के सामने समर्पण करना और उससे व्युत्पन्न न होने वाले हर दावे को ख़ारिज करना है।
ऐसा दृष्टिकोण ग्रीको-रोमन दुनिया में समझी जाने वाली राजनीति की ज़रूरत और औचित्य—दोनों को ख़त्म कर देता है। यह दृष्टिकोण कम से कम आंशिक रूप से प्लेटो के Republic के साथ संगत था, लेकिन अरस्तू की Politics से, थ्यूसिडाइडीज़ की History of the Peloponnesian War में वर्णित अंतहीन राजनीतिक दाँव-पेचों और तात्कालिक जुगाड़ों से, ग्रीक त्रासदी और कॉमेडी—दोनों में व्याप्त राजनीतिक रस्साकशी से, रोमन विधि-निर्माण के पूरे संग्रह से, और रोम के महानतम इतिहासकारों द्वारा दर्ज बेहद मानवीय राजनीतिक संघर्षों से यह सीधा टकराता था। इस तरह व्याख्यायित क़ुरआन ने शब्द के पश्चिमी अर्थ में राजनीति की पूरी धारणा को ही बाहर कर दिया और राजनीतिक दलों व गुटों, राजनीतिक जीवनियों, और विधि-निर्माण पर संघर्षों से जुड़ी शास्त्रीय कृतियों के अनुवाद को न सिर्फ़ अप्रासंगिक, बल्कि अधार्मिक भी ठहरा दिया—क्योंकि इसे ऐसे व्यवहार को बढ़ावा देने का साधन माना गया, जो पवित्र ग्रंथ को कमज़ोर करता हो। इसी कारण उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
बेशक, कुछ मुसलमानों की राय इससे अलग थी, जिनमें ख़ास तौर पर तर्कवादी मुतज़िला शामिल थे, जो अब्बासी ख़िलाफ़त में सरकारी संरक्षण के तहत थोड़े समय के लिए फले-फूले। लेकिन इसे ईश्वरीय वचन पर हमला माना गया और नतीजा हमेशा उन शाब्दिकतावादियों की जीत के रूप में निकला, जो क़ुरआनी परंपरा के आगे समर्पण की माँग करते थे। पूरी मुस्लिम दुनिया में धार्मिक सत्ता के आगे समर्पण की ऐसी दो-टूक पुकारें, इसके बाद की सदियों में लगातार दोहराई जाती रहीं।
राजनीति और समाज में निर्विकार तर्क के प्रयोग के प्रति मुस्लिम शत्रुता पर लिखी किताब What Went Wrong? में दिवंगत ब्रिटिश विद्वान बर्नार्ड लुईस ने इस मसले की जड़ें तुलनात्मक रूप से आधुनिक समय में खोजीं। उन्होंने इस्लामी संस्कृति के स्वर्ण युग की भरपूर प्रशंसा की, लेकिन तर्क दिया कि इसके बाद मुस्लिम पूर्व पीछे फिसलता चला गया—और यह प्रक्रिया पुनर्जागरण और उसके बाद आए विज्ञान के युग में उसकी गैर-भागीदारी पर जाकर अपने चरम पर पहुँची। लुईस के तर्क का निहितार्थ यह था कि आज के दूरदर्शी मुसलमानों का काम सिर्फ़ आधुनिक पश्चिम से उधार लेना नहीं है, बल्कि दूरस्थ इस्लामी अतीत के वैभव का अध्ययन कर उसे फिर से हासिल करना है।
यह आह्वान पूर्व और पश्चिम—दोनों में कई लोगों को आकर्षित करता है। कई दूरदर्शी मुस्लिम सरकारों ने इसे आधिकारिक सिद्धांत के रूप में अपनाया है। वास्तव में, इस निबंध के लेखक ने लंबे समय से ऐसे ही दृष्टिकोण का समर्थन किया है और किताबों तथा लेखों में इसे विकसित भी किया है। हालांकि, इस उचित पुकार में एक समस्या है—यह कि इस्लाम के स्वर्ण युग ने समाज, राजनीति और क़ानून पर उस हर गंभीर चर्चा को अपनी मुख्यधारा से व्यवस्थित रूप से बाहर रखा, जैसा कि शास्त्रीय दुनिया के उस साहित्य में समझा गया था, जिसे उसने अन्य मामलों में इतनी पूर्णता से अपनाया। बग़दाद के नेतृत्व और मुस्लिम दुनिया के धर्मनिष्ठ बुद्धिजीवी वर्ग—दोनों ने इस प्रतिबंध को स्वीकार किया और लागू कराया।
हालांकि इस कार्रवाई के कारण और प्रेरणाएँ जटिल थीं, लेकिन यह साफ़ है कि इसका मुख्य आधार यह विश्वास था कि समाज, क़ानून और राजनीति से जुड़े सभी सवालों का सही दृष्टिकोण अल्लाह ने अपने पैग़ंबर मुहम्मद पर प्रकट कर दिया था, और वह क़ुरआन तथा हदीसों में व्यक्त हो चुका है। जब तक इन ग्रंथों को शाब्दिक और पूर्ण रूप में स्वीकार कर लागू किया जाता रहा—जैसा कि आधुनिक काल तक अधिकांश मुस्लिम समाजों में बड़े पैमाने पर होता रहा—तब तक उन्होंने समाज और राजनीति पर स्वीकार्य विमर्श के दायरे को काफ़ी सीमित कर दिया। नतीजतन, इस्लाम की दुनिया धार्मिक बंधनों में जकड़ी रही और उन अवधारणाओं से वंचित रही, जो राजनीति, भागीदारी और क़ानून को इन शब्दों के पश्चिमी अर्थ में समझने के लिए ज़रूरी थीं।
इसका नतीजा यह हुआ कि स्वर्ण युग के मुस्लिम विचारकों ने बाद की पीढ़ियों के लिए समाज और शासन का ऐसा दृष्टिकोण छोड़ा, जो पुनर्जागरण के बाद के किसी भी आधुनिक समाज की तुलना में किसी प्राचीन निरंकुश व्यवस्था या प्लेटो के अधिनायकवादी स्वप्नलोक में कहीं ज़्यादा स्वाभाविक लगता। आरंभिक मुस्लिम दुनिया में विज्ञान और चिकित्सा को अपनाने की आधुनिकता के ठीक उलट, शासन और समाज के क्षेत्र में स्वर्ण युग की विरासत का केंद्र एक ऐसे अकेले, निरपेक्ष विधि-निर्माता और शासक का आदर्श था, जो धर्मनिष्ठ और आज्ञाकारी जनता के जीवन के हर पहलू पर असीमित, केंद्रीकृत सत्ता चलाए।
ऐसा दृष्टिकोण आज के मुस्लिम समाजों के लिए कौन-से रास्ते खोलता है? तीन विकल्पों की बात की जा सकती है। पहला, कट्टरपंथी रास्ता: अतीत की ओर पूरी तरह लौट जाना, जैसा कि अलग-अलग स्तर पर सलफ़ियों, वहाबियों, मुस्लिम ब्रदरहुड, सैयद क़ुतुब, अल-क़ायदा और तालिबान ने किया। दूसरा, पूर्ण धर्मनिरपेक्षता: मुस्लिम विरासत को नकारते हुए राज्य और क़ानूनों का पूरी तरह धर्मनिरपेक्षीकरण करना, जैसा कि अतातुर्क, मध्य एशिया के सोवियत शासकों, जमाल अब्दुल नासिर और शाह रज़ा पहलवी ने किया। तीसरा: ऐसा रास्ता, जिसमें धर्मगुरुओं और आस्था की माँगों के प्रति सम्मान तो हो, लेकिन अधीनता न हो। यह तीसरा रास्ता ऐसे धर्मनिरपेक्ष क़ानूनों, अदालतों और राज्य संस्थाओं की वकालत करता है, जो पारंपरिक आस्था का सम्मान करें, लेकिन उसकी हर माँग या उसकी व्याख्या करने वाले मुल्लाओं के अधीन न हों।
इस अध्ययन का उद्देश्य यह नहीं है कि उन समकालीन विचारकों और शासन व्यवस्थाओं की सूची बनाई जाए, जिन्होंने इन विकल्पों में से किसी को अपनाया है, या उनकी सफलताओं और विफलताओं का मूल्यांकन किया जाए। इतना कहना काफ़ी है कि पूरी मुस्लिम दुनिया में ऐसे स्वतंत्र सोच वाले विचारक और राजनेता मौजूद हैं, जिन्होंने संप्रभुता और नागरिकता की उन धारणाओं को अपनाया है, जिन्हें उनके आलोचक “पश्चिमी” कहते हैं। हालांकि, तीसरे विकल्प को सबसे व्यापक रूप में अपनाने का उदाहरण—यानी राज्य, क़ानून और नागरिक समाज पर आधुनिक विचारों को धार्मिक परंपरा के सम्मान के साथ जोड़ना, लेकिन उसके नियंत्रण में न जाना—वृहत्तर मध्य एशिया के नव-संप्रभु राज्यों में मिलता है; ख़ासकर उज़्बेकिस्तान में, लेकिन कज़ाख़िस्तान और किर्गिज़ गणराज्य में भी।
सोवियत-उत्तर राज्यों के पास यह लाभ था कि USSR के पतन ने उन्हें अपनी राज-व्यवस्थाओं को de novo सिरे से गढ़ने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने यह काम यथार्थ-राजनीति (Realpolitik), नागरिकता, अदालतों और अधिकारों पर पश्चिमी अवधारणाओं, और मुस्लिम चिंतन के कुछ महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित पहलुओं के मिश्रण से किया। 1991 से अब तक उनके विकास के तीन स्पष्ट चरण पहचाने जा सकते हैं। पहले चरण में USSR के पतन ने मध्य एशिया की पूरी पट्टी में सत्ता और विचारधारा का शून्य पैदा कर दिया। वहाबियों और राजनीतिक इस्लाम के अन्य हिमायतियों ने इस संकट को भुनाया और मध्य एशिया में हथियारबंद कार्यकर्ताओं तथा धर्मप्रचारकों की बाढ़-सी ला दी। स्वदेशी इस्लामवादी, जो सोवियत काल में अदृश्य भूमिगत नेटवर्क के रूप में मौजूद थे, अब खुलकर सामने आ गए और बाहर से आए धर्मप्रचारक समूहों के साथ साझा मोर्चा बना लिया। नई सरकारों ने इन समूहों पर कड़ा प्रहार किया और बल के जवाब में बल का इस्तेमाल किया। किर्गिज़स्तान ने इसके बजाय ऐसे समूहों को साथ मिलाने की कोशिश की, लेकिन वह नाकाम रहा। ताजिकिस्तान में गृहयुद्ध ने इस सोवियत-उत्तर राज्य को लगभग ढहा ही दिया था। इस दौरान नए शासकों पर पश्चिमी सरकारों और मानवाधिकार संगठनों की आलोचनाओं का तूफ़ान टूट पड़ा—शब्दों की यह सुनामी 2005 में चरम पर पहुँची, जब उज़्बेक सरकार ने उज़्बेक शहर अंदिजान में भारी हथियारों से लैस इस्लामवादी विद्रोह को कुचल दिया।
इसी बीच, दूसरा चरण तब शुरू हुआ, जब नई सरकारें नए संविधान और क़ानूनों का मसौदा तैयार करने में जुटीं। चूँकि यही उन्हें सबसे बेहतर पता था, इसलिए उन्होंने सबसे पहले रूसी विधि-विचारकों की ओर रुख़ किया—अतीत के भी, और वर्तमान के भी। हालांकि आरंभिक रूस ने दसवीं सदी में बाइज़ेंटाइन ईसाइयत को अपनाया था, लेकिन उसने न तो जस्टिनियन संहिता और न ही रोमन क़ानून के अन्य तत्वों को अपनाया। लेकिन अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं सदी में रूस के न्यायिक सुधारकों ने रोमन क़ानून के पूरे ढाँचे को आत्मसात कर लिया था; यह उन्हें जर्मन विधि-संहिताओं को बड़े पैमाने पर अपनाने के चलते पता चला था। हैरानी की बात है कि विधि-विचार की यह धारा सोवियत काल तक बनी रही और सोवियत न्यायशास्त्र में भी झलकी (भले ही शायद ही कभी लागू हुई हो)। नतीजतन, रोमन क़ानून के तत्व औपनिवेशिक मध्य एशिया में वकीलों और न्यायाधीशों की साझा विरासत बन गए। इस बौद्धिक प्रवाह के साथ-साथ ग्रीक और रोमन राजनीतिक चिंतन के क्लासिक ग्रंथों का रूसी में बड़े पैमाने पर अनुवाद और प्रकाशन भी हुआ, जिनमें अरस्तू की Politics, थ्यूसिडाइडीज़, सिसरो और सैलस्ट शामिल थे।
इन दोनों घटनाक्रमों ने मिलकर मुस्लिम मध्य एशिया के लिए राजनीति पर चिंतन का वह पूरा भंडार खोल दिया, जिससे मुस्लिम ख़िलाफ़त ने एक सहस्राब्दी पहले मुँह मोड़ लिया था। इन्हीं की बदौलत मध्य एशिया के सोवियत-उत्तर संविधानों में राज्य, नागरिकता, संप्रभुता और नागरिक प्रक्रिया पर शास्त्रीय पश्चिमी दृष्टिकोण शामिल हैं। इससे भी अहम यह है कि इन मुस्लिम समाजों के सभी नए संविधानों में ऐसे अनुच्छेद हैं, जो यह पुष्टि करते हैं कि धार्मिक संस्थाएँ और संगठन राज्य से अलग हैं और उसके क़ानूनों के अधीन हैं। भले ही व्यवहार में इन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ किया गया हो, लेकिन ये नवाचार क्षेत्र के अतीत से एक निर्णायक विच्छेद को चिह्नित करते हैं। कि यह सब मध्य एशिया में रूसी और फिर सोवियत औपनिवेशिक शासन के कारण संभव हुआ, इतिहास के अनेक विरोधाभासों में से एक है।
कहने की ज़रूरत नहीं कि इन अहम मसलों पर बहस मुख्यतः पेशेवर न्यायविदों, शिक्षाविदों और शीर्ष सरकारी अधिकारियों तक ही सीमित रही। लेकिन सुधार के तीसरे चरण की शुरुआत करते हुए, मध्य एशिया की सरकारों ने अपनी नई सोच को इस्लाम के सिद्धांतों के साथ बैठाने की कोशिश की है। अपने इलाक़े में इस्लामी आतंकवाद के सफल दमन और ऐसे दमन को जायज़ ठहराने वाले क़ानूनों के निरस्तीकरण के चलते अब यह काम शांति से संभव था। इस परियोजना के नतीजे में उन प्राचीन विकल्पों का पुनरुत्थान और पुनर्जीवन हुआ है, जो उन दमनकारी रूढ़िवादिताओं के मुक़ाबले खड़े थे, जिन्होंने एक सहस्राब्दी तक इस आस्था पर दबदबा बनाए रखा। इसमें उज़्बेकिस्तान ने अग्रणी भूमिका निभाई है। बग़दाद ख़िलाफ़त के स्वर्ण युग पर मध्य एशिया की गहरी छाप थी। उसकी सेना बड़े पैमाने पर मध्य एशियाइयों से बनी थी, और ख़ुद बग़दाद की रूपरेखा का स्रोत उस प्रारूप में खोजा जा सकता है, जो आज के तुर्कमेनिस्तान में मौजूद था।
बौद्धिक क्षेत्र में अगुवाई आज के उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के बल्ख़ से जुड़े उल्लेखनीय बरमक (Barmak) परिवार के सदस्यों ने की। बौद्ध धर्म से धर्मांतरित बरमकों की ही वजह से ख़िलाफ़त ने चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया और भारतीय गणित व खगोलशास्त्र के प्रति उसकी जिज्ञासा बढ़ी।
बल्ख़—सदियों तक बौद्ध धर्म का एक बड़ा केंद्र रहने के अलावा—ज़रथुस्त्र का जन्मस्थान भी था, जो फ़ारसी प्रभाव वाले पूरे पूर्व की प्राचीन आस्था के संस्थापक थे। ख़ुरासान कहलाने वाला यह क्षेत्र, जिसमें आज की अफ़ग़ान–ईरानी सीमा के पास निशापुर जैसे शहर भी शामिल थे, बग़दाद और अन्य मुस्लिम इलाक़ों में व्याप्त रूढ़िवादिता और हठधर्मिता के प्रतिरोध का एक प्रमुख केंद्र बन गया। इस “बल्ख़ धर्मशास्त्र” का मूल तत्व मानवीय कर्तृत्व को स्वीकार करना है। इसका कहना है कि आस्था दिल से आती है, दूसरों के मार्गदर्शन से नहीं। इसलिए यह मानता है कि लोग पैग़ंबरी मार्गदर्शन के बिना तर्क का इस्तेमाल करने और ईश्वर-प्रदत्त संभावनाओं के दायरे में अपने कर्म तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।
उज़्बेकिस्तान और मध्य एशिया के अन्य हिस्सों के आज के मुस्लिम सुधारक न सिर्फ़ ज्ञानमीमांसा की इस गहरी क्षेत्रीय परंपरा को अपनाते हैं, बल्कि उसके उपेक्षित आरंभिक पैरोकार—दसवीं सदी के न्यायविद अबू मंसूर अल-मातुरीदी (Abu Mansur al-Maturide)—को भी उन्होंने अग्रभूमि में ला दिया है। समरकंद में जन्मे मातुरीदी न्यायशास्त्र के उस कम सत्तावादी हनफ़ी सिलसिले के प्रतीक थे, जिसने मध्य एशिया में शुरुआती दौर में ही जड़ें जमा ली थीं और जो आज भी वहाँ प्रचलित है। उन्होंने सिखाया कि अल्लाह ने सभी संभावनाएँ पैदा कीं और मनुष्यों को उनमें से चुनने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया। सार्वजनिक क्षेत्र में उन्होंने आस्थाओं को कर्मों से अलग रखा।
उज़्बेकिस्तान और अन्य जगहों के आधुनिक न्यायविदों ने जल्दी ही समझ लिया कि यह व्याख्या अधिकारों, नागरिकता और नागरिक भागीदारी की उन अवधारणाओं के रास्ते से मुस्लिम बाधाएँ हटा देती है, जिन्हें आस्था के शुरुआती दिनों से ही या तो हाशिये पर धकेल दिया गया था या प्रतिबंधित कर दिया गया था। उन्होंने यह भी समझा कि यह “प्रबुद्ध इस्लाम” इस्लाम और शासन, क़ानून तथा नागरिक जीवन की उन लंबे समय से दबा दी गई अवधारणाओं के बीच पूर्ण सुलह का रास्ता खोलता है, जो शास्त्रीय ग्रीस और रोम में प्रचलित थीं। इन्हीं विचारों से लैस होकर, 2020 में उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव ने विचारक के गृहनगर में मातुरीदी पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया। पूरे क्षेत्र और उससे बाहर के विचारक अब इस उपेक्षित चिंतक को आधुनिकता तक पहुँचने वाले एक मुस्लिम सेतु-निर्माता के रूप में अपना रहे हैं।
उज़्बेक और अन्य मध्य एशियाई समाज क़ानूनी और नागरिक क्षेत्रों में ऐसी प्रगति कर रहे हैं, जिस पर पूरी मुस्लिम दुनिया और उससे बाहर का भी ध्यान जाना चाहिए। इस्लाम पर हमला करने के बजाय, ये सुधारक मुस्लिम चिंतन की उपेक्षित धाराओं और नागरिक क़ानून तथा शासन की शास्त्रीय पश्चिमी अवधारणाओं को जोड़कर समाज और राजनीति के उन दृष्टिकोणों को आगे बढ़ा रहे हैं, जिनसे इस्लाम के स्वर्ण युग ने एक सहस्राब्दी पहले मुँह मोड़ लिया था।
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एस. फ़्रेडरिक स्टार (S. Frederick Starr) सेंट्रल एशिया-कॉकस इंस्टिट्यूट के संस्थापक अध्यक्ष और अमेरिकन फ़ॉरेन पॉलिसी काउंसिल में यूरेशिया के लिए डिस्टिंग्विश्ड फ़ेलो हैं, जिसका आधार वॉशिंगटन, डी.सी. और स्टॉकहोम, स्वीडन में है।
* Anthony Kaldellis, “Aristotle’s Politics in Byzantium,” in Well Begun Is Only Half Done: Translating Aristotle’s Political Ideas in Medieval Arabic, Syriac, Byzantine, and Jewish Sources , ed. Vasileios Syros, vol. 388 of Medieval and Renaissance Texts and Studies (Turnhout: Brepols, 2011), 121.
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