ज़ोहरान ममदानी को समझने की सही मध्य-पूर्वी कसौटी क्या है
वह इस्लामवादी नहीं, बल्कि एक मुस्लिम क़बीलावादी हैं जो मानते हैं कि श्वेत नस्ल ने मध्य-पूर्व के मुसलमानों का शोषण किया है।
Shay Khatiri यॉर्कटाउन इंस्टिट्यूट (Yorktown Institute) में वरिष्ठ फ़ेलो और रेनी सेंटर (Rainey Center) में फ़ेलो हैं।

न्यूयॉर्क शहर के मेयर पद के क़रीब पहुँचे ज़ोहरान ममदानी (Zohran Mamdani) के उभार ने ईरानी विपक्ष का ध्यान खींचा है। विपक्ष के ज़्यादातर लोग इसे इस्लामी गणराज्य के ख़िलाफ़ अपने अभियान के लिए नैतिक झटका मानते हैं। राजशाही समर्थक तो उनकी तुलना रूहुल्लाह ख़ुमैनी से तक कर देते हैं, जिन्होंने सत्ता संभालने से पहले ईरानियों से बड़े-बड़े वादे किए और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात की, लेकिन नियंत्रण मज़बूत करते ही प्रतिगामी वैचारिक एजेंडे पर चल पड़े।
ममदानी की तुलना ख़ुमैनी से करना आसान है। ममदानी बारहवें इमाम को मानने वाले (ट्वेल्वर) शिया हैं, ज़ायनवाद-विरोधी हैं और संभवतः यहूदी-विरोधी भी, लेकिन ख़ुमैनी से समानताएँ यहीं ख़त्म हो जाती हैं। ममदानी इस्लामवादी नहीं हैं। उनकी पत्नी किसी मिलेनियल न्यूयॉर्कवासी की तरह कपड़े पहनती हैं, और समलैंगिक तथा ट्रांसजेंडर मुद्दों पर उनके विचार धुर वामपंथी हैं। ऐसे रुख़ ख़ुमैनी को नाराज़ करते।
शायद बेहतर उपमा मध्य-पूर्व में कहीं और मिलती है। हडसन इंस्टीट्यूट (Hudson Institute) की ज़ीनब रिबुआ (Zineb Riboua) ममदानी और अल्जीरियाई क्रांति के बीच समानताएँ खींचती हैं। उनका तर्क है कि ममदानी शोषक और शोषित के बीच तीसरी दुनिया वाले प्रतिमान को आगे बढ़ाते हैं। वह समझाती हैं, “ममदानी जिसका प्रतिनिधित्व करते हैं वह कोई नया आंदोलन नहीं, बल्कि एक पुरानी संवेदना की वापसी है जिसका ख़ुद अमेरिका ने कभी प्रतिरोध किया था और जिसे उसने पीछे छोड़ दिया था।” “आवास, पुलिसिंग और फ़लस्तीन पर उनके रुख़ वैश्विक साम्राज्यवाद-विरोधी विरासत को अमेरिकी यथार्थ में ढाल देते हैं। मकान-मालिक उपनिवेशक में बदल जाता है, किरायेदार उपनिवेशित में।” और न ही ममदानी पहले व्यक्ति होंगे जिन पर अल्जीरिया का असर पड़ा हो। ईरान के पूर्व दूत रॉब मैली (Rob Malley) की माँ बारबरा सिल्वरस्टीन मैली (Barbara Silverstein Malley) ने अपनी समाजवादी समझ की शुरुआती घिसाई अल्जीरिया के नेशनल लिबरेशन फ़्रंट के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधिमंडल के लिए काम करते हुए की थी।
फिर भी, रिबुआ जहाँ ममदानी के विचारों का संदर्भ जोड़ती हैं, वहीं वह यह आँकने में चूक जाती हैं कि मुसलमान होना—चाहे धार्मिक आचरण करने वाले हों या नहीं—ममदानी की राजनीति को कितना गढ़ता है। वह इस्लामवादी नहीं हैं, लेकिन वह एक मुस्लिम क़बीलावादी हैं।
इस क़बीलावादी दृष्टि के मुताबिक़, श्वेत नस्ल ने बाक़ी तीसरी दुनिया के साथ-साथ मध्य-पूर्वी मुसलमानों का भी शोषण किया है। वह यहूदियों को श्वेत बसने वालों और फ़लस्तीनियों को रंग वाले मूल निवासियों के रूप में देखते हैं। ममदानी के लिए मुसलमान असमानों में प्रथम हैं। इसी संदर्भ में ममदानी ने ग़लत ढंग से कहा था कि 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद उनकी चाची को न्यूयॉर्क में हिजाब पहनने में डर लगता था।
ममदानी का क़बीलावाद ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमलों की उनकी निंदा में, नस्ल-आधारित राज्यों की निंदा करते समय शुरुआत में मुस्लिम राज्यों को छोड़ देने में, हमास से हथियार डालने की अपील करने से इनकार में, और कट्टरपंथी इमामों से उनके जुड़ाव में प्रकट हुआ। अपने निजी जीवन के बावजूद, वह एकजुटता को अनिवार्य मानते हैं।
यहाँ वह ईरान के पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग़ से मिलते-जुलते हैं। ममदानी की तरह मोसद्देग़ भी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के ज़रिए सत्ता में आए और बाद में उन्हीं प्रक्रियाओं को हड़प लिया। ममदानी की तरह वह भी एक धर्मनिरपेक्ष नेता थे, जिनके काम पर विदेशी ताक़तों के प्रति तात्कालिक घृणा की छाप थी, भले ही इसकी क़ीमत उनके अपने जनाधार को चुकानी पड़े। बॉयकॉट-डाइवेस्ट-सैंक्शंस (Boycott-Divest-Sanctions) आंदोलन को ममदानी का समर्थन इसी समानांतर में बैठता है, क्योंकि यह न्यूयॉर्क की अर्थव्यवस्था को उसी तरह नुक़सान पहुँचाएगा, जैसे तेल निकालने के अमेरिकी प्रस्ताव को मोसद्देग़ के ठुकराने से ईरानी अर्थव्यवस्था को नुक़सान हुआ था।
तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की मोसद्देग़ की कोशिश ने “स्वतंत्रता” की माँग करने वाली पश्चिम-विरोधी भावनाओं को हवा दी। स्वतंत्रता के लिए फ़ारसी शब्द एस्तेक़लाल 1979 के क्रांतिकारियों के नारों में से भी एक बन गया। लेकिन ऐसी बयानबाज़ी से परे, मोसद्देग़ की असली महत्वाकांक्षा ईरान के तेल उद्योग को राज्य के नियंत्रण में लाना थी।
मोसद्देग़ धर्मनिरपेक्ष नेता थे, लेकिन इसराइल के साथ रिश्तों में उनका मुस्लिम क़बीलावाद सामने आ गया। 1951 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यरुशलम में ईरान का वाणिज्य दूतावास बंद कर दिया और इसराइल को जर्मन क्षतिपूर्ति का विरोध किया। निजी तौर पर वह इसराइल को एक ब्रिटिश औपनिवेशिक परियोजना मानते थे। उन्होंने अपने गठबंधन में धर्मनिष्ठ तबक़े को शामिल किया और आयतुल्लाह महमूद तालेग़ानी को ताक़त दी, जिन्होंने ज़ायनवाद-विरोध को ईरानी मुख्यधारा की राजनीति में शामिल किया। मोसद्देग़ के लिए ज़ायनवाद-विरोध में राजनीतिक सुविधा, क़बीलावाद और तीसरी दुनिया की विचारधारा का मेल था।
किसी सकारात्मक सिद्धांत के बजाय नकारात्मक भावना के इर्द-गिर्द राजनीति को संगठित करना आसान होता है। “विरोध” की राजनीति ने एक सदी से इस क्षेत्र को ग्रस रखा है—यह आबादियों को बाहरी ताक़तों के ख़िलाफ़ गोलबंद तो करती है, लेकिन उदारवाद को कभी आगे नहीं बढ़ाती।
अमेरिकी अभिजात वर्ग ने मोसद्देग़ और अल्जीरियाई क्रांतिकारियों सरीखों को नायक बना दिया है। ईरानी प्रवासी समुदाय बड़े पैमाने पर पूँजीवाद और धर्मनिरपेक्षता को अपनाता है, क्योंकि धार्मिक क़बीलावाद और वामपंथ के साथ उसका अनुभव नकारात्मक रहा है। ममदानी की ख्याति उन्हें हतोत्साहित करती है। इस आशंका से कि अभिजात वर्ग कहीं मोसद्देग़ वाली उपमाओं को समर्थन न समझ ले, वे इसके बजाय ख़ुमैनी से की गई एक ग़लत तुलना को अपना लेते हैं।
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