सीरिया के कुर्दों की मदद के लिए इसराइल आगे क्यों नहीं आ रहा
अमेरिका, तुर्की, सीरिया, ईरान और रूस के साथ रिश्ते इस फ़ैसले को प्रभावित करते हैं, और कुर्दों को ही नुक़सान पहुँचने का ख़तरा भी।

कई कुर्दों में यह कड़वाहट बनी हुई है कि वर्षों के बयानों के बावजूद, जब सीरियाई बल उन पर हमले कर रहे हैं, इसराइल ने उनकी मदद के लिए बहुत कम किया है। कुर्द जिसे परित्याग मानते हैं—शायद उसी स्तर का जैसा 1975 की कुर्द क्रांति के पतन की पृष्ठभूमि में अमेरिका और इसराइल द्वारा समर्थन बंद कर देने पर हुआ था—उसे यरुशलम कई हितों और बदलते समीकरणों के बीच संतुलन साधते हुए रणनीतिक संयम के रूप में देखता है। नीति-निर्माताओं को डर है कि खुले हस्तक्षेप की क़ीमत लाभ से ज़्यादा होगी और इससे ख़ुद कुर्दों के लिए पहले से ख़राब नतीजे और बिगड़ सकते हैं; इसलिए इसे वे तमाम बुराइयों में “सबसे कम बुराई” मानते हैं।
इसराइल की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ अब भी ईरानी मोर्चा और हिज़्बुल्लाह की सैन्य क्षमता को ध्वस्त करने की कोशिश बनी हुई हैं। इन लक्ष्यों के लिए लगातार सैन्य एकाग्रता और वॉशिंगटन के साथ तालमेल ज़रूरी है। पूर्वोत्तर सीरिया में एक दिखाई देने वाला मोर्चा खोलने से यह एकाग्रता बँटेगी और नई देनदारियाँ पैदा होंगी। कुर्द बलों के ख़िलाफ़ तुर्की समर्थित सीरियाई हमले का समय इसी हक़ीक़त के मुताबिक़ तय किया गया लगता है। दमिश्क़ समझता है कि इसराइल का ध्यान बँटा हुआ है और कहीं और तनाव बढ़ाने की उसकी क्षमता सीमित है।
इस गणित में तुर्की केंद्रीय है। अंकारा कुर्द बलों के लिए किसी भी खुले इसराइली समर्थन को उन समूहों के साथ सीधी गोलबंदी के रूप में पढ़ेगा, जिन्हें तुर्की शत्रु मानता है। इससे ऐसे समय टकराव छिड़ेगा, जब इसराइल उसे वहन नहीं कर सकता। यह ख़तरा सिर्फ़ द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है। ग़ज़ा से जुड़ी व्यवस्थाओं, क्षेत्रीय मंचों और वॉशिंगटन तक पहुँच के रास्तों पर तुर्की का प्रभाव सीरिया में उठाए गए क़दम को ग़ज़ा और उससे आगे की क़ीमत में बदल देगा।
हाल के अमेरिकी संकेत इस अड़चन को और बढ़ाते हैं। ग़ज़ा की शासन-व्यवस्था में तुर्की को शामिल किए जाने की घोषणा बताती है कि वॉशिंगटन अंकारा को संघर्ष-पश्चात प्रबंधन में जोड़ना चाहता है। इसका समय एक चेतावनी की तरह काम करता है। इस समय तुर्की के साथ किसी भी सार्वजनिक टकराव का ठीकरा व्हाइट हाउस संभवतः इसराइल के सिर फोड़ेगा।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर निर्भरता इस संयम को और गहरा करती है। ईरानी मोर्चे पर इसराइल को प्रतिबंधों के अनुपालन, ख़ुफ़िया जानकारी साझा करने और संभावित हमले के विकल्पों के लिए अमेरिकी समर्थन चाहिए। कोई भी सार्वजनिक विवाद जो उस समर्थन को जोखिम में डाले, ऐसे नतीजे लाता है जिन्हें इसराइल स्वीकार नहीं कर सकता। ग़ज़ा इसमें एक और परत जोड़ता है। युद्धविराम की शर्तों, पुनर्निर्माण की निगरानी और क्षेत्रीय सहमति को संभालने के लिए इसराइल को अमेरिकी आवरण और तालमेल चाहिए। इन परिस्थितियों में यरुशलम सीरिया में तुर्की को चुनौती देकर वॉशिंगटन की सहनशीलता की परीक्षा नहीं लेगा।
सीरियाई चैनल भी है। इसराइल और दमिश्क़ सुरक्षा व्यवस्थाओं पर किसी समझ की टोह ले रहे हो सकते हैं। मेज़ पर इसराइल के बुनियादी हित हैं: सीरियाई हवाई क्षेत्र में ईरानी ठिकानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की आज़ादी; ईरान से सीरिया के रास्ते हिज़्बुल्लाह तक हथियारों की आवाजाही रोकना; दक्षिणी सीरिया में स्थिरता; और गोलान के पास द्रूज़ समुदायों की सुरक्षा। ऐसी बातचीत में इसराइल का दबाव संयम और मौन स्वीकृति में निहित है। सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (SDF) के ख़िलाफ़ दमिश्क़ के अभियान की पृष्ठभूमि में पीछे हटना—यहाँ तक कि कुर्दों को छोड़ देना—शायद वही क़ीमत है जो चुकाई जा रही है।
फिर रूस है। मॉस्को सीरिया में फिर से प्रभाव चाहता है। इसराइल ईरानी ठिकानों के ख़िलाफ़ अपनी परिचालन स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए रूस के साथ टकराव-निवारण चाहता है। इसराइली और रूसी नेताओं के बीच हाल के संपर्क, जिनमें तेहरान के साथ मध्यस्थता की मॉस्को की पेशकश भी शामिल है, सक्रिय पिछले दरवाज़ों का संकेत देते हैं। ऊर्जा प्रतिस्पर्धा भी मायने रखती है। ग्रीस और साइप्रस के साथ तालमेल में यूरोप को गैस निर्यात बढ़ाने की इसराइल की कोशिश रूसी हितों को चुनौती देती है। रूस के पास इसराइल पर परोक्ष दबाव डालने के साधन भी हैं, जिनमें सीरिया और लाल सागर के रास्ते भी शामिल हैं। मॉस्को के साथ ख़ामोश समझदारियाँ ऊँची प्राथमिकता वाले मोर्चों पर लाभ दिला सकती हैं, साथ ही ऐसे दिखाई देने वाले क़दमों को भी हतोत्साहित करती हैं जो सीरिया में रूसी हिस्सेदारी को चोट पहुँचाएँ।
सार्वजनिक हस्तक्षेप से कुर्दों को नुक़सान पहुँचने का ख़तरा भी होगा। विरोधी, दिखाई देने वाले इसराइली समर्थन का इस्तेमाल कुर्द बलों को विदेशी मोहरों के रूप में पेश करने के लिए करेंगे—इससे और कठोर दमन को न्योता मिलेगा और निशाने का दायरा सीरिया से बाहर ईरान और इराक़ के कुर्द समुदायों तक फैल जाएगा। पिछले प्रसंग दिखाते हैं कि उजागर होने से स्थानीय साझेदारों को चुकानी पड़ने वाली क़ीमत बढ़ जाती है। विवेक उस क़ीमत को घटा सकता है।
इन बातों का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि इसराइल उदासीन है; बात बस इतनी है कि उसकी प्राथमिकता अपेक्षाकृत ख़ामोश या अधिक गुप्त रास्ते हैं। ऐसे तरीक़ों का मक़सद कुर्दों की गुंजाइश बनाए रखना है—बिना ऐसी तनाव-वृद्धि को जन्म दिए जिसे इसराइल झेल नहीं सकता और जो कुर्दों को और बदतर हालत में छोड़ देगी।
इराक़ में 1975 में कुर्द विद्रोह के पतन से किसी भी तरह की तुलना का सुझाव देना एक लांछन होगा। सीरिया में जो हुआ है वह न तो जानबूझकर किया गया है और न ही विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर जैसी निर्ममता का नतीजा है, बल्कि यह अस्तित्व के लिए ख़तरा बने विरोधियों से भरे पड़ोस की पृष्ठभूमि में बहुत कम विकल्पों का त्रासद प्रकटीकरण है।
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