इसराइली शहरों पर मिसाइल हमलों पर मुक़दमे विरले ही क्यों चलते हैं
अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून नागरिकों पर लक्षित हमलों और ऐसे हमलों को प्रतिबंधित करता है जो नागरिक और सैन्य ठिकानों में भेद नहीं कर पाते।
एरन जे. शूस्टर (Aaron J. Shuster) कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले पुरस्कार विजेता फ़िल्मकार और लेखक हैं। उनका काम नैतिक ज़िम्मेदारी, इसराइल और लोकतांत्रिक समाजों के सामने मौजूद रणनीतिक चुनौतियों पर केंद्रित है।

19 जून 2025 को एक ईरानी मिसाइल बेयरशेबा स्थित सोरोका मेडिकल सेंटर पर गिरी, जिसमें नागरिक घायल हुए और दक्षिणी इसराइल के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक को नुक़सान पहुँचा। युद्ध के अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत अस्पतालों को विशेष संरक्षण प्राप्त है। बीमारों और घायलों की रक्षा 1864 के जिनेवा कन्वेंशन का बुनियादी सिद्धांत रही है। जब तक अस्पतालों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए न हो, वे वैध निशाने नहीं होते। सोरोका मेडिकल सेंटर पर हुए हमले के साथ ऐसा कोई दावा नहीं किया गया। घटना ने सुर्ख़ियाँ तो बटोरीं, लेकिन इससे क़ानूनी कार्रवाई नहीं हुई।
वह हमला कोई अकेली घटना नहीं थी। 1 अप्रैल 2026 को हिज़्बुल्लाह द्वारा मिसाइलों की बौछार छोड़े जाने के बाद तेल अवीव में सायरन बजे। जैसे ही चेतावनी प्रणाली सक्रिय हुई और मिसाइलें नागरिक इलाक़ों को निशाना बना रही थीं, पूरे शहर में नागरिक शरणस्थलों में चले गए।
यमन के हूती जैसे अन्य गुटों ने भी इसराइल की ओर मिसाइलें और ड्रोन दाग़े हैं और आगे भी ऐसा करने का वादा किया है। हमास ने अश्कलोन की ओर बिना दिशा-नियंत्रण वाले रॉकेट दाग़े, जिससे नागरिकों को शरणस्थलों में और आपातकालीन दल को सड़कों पर आना पड़ा। हमलावर अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन रणनीतिक तरीक़ा वही रहता है: वे दहशत फैलाने, संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने और नागरिकों को घायल करने या मारने के लिए नागरिक इलाक़ों की ओर मिसाइलें और रॉकेट दाग़ते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून नागरिकों पर सीधे लक्षित हमलों को प्रतिबंधित करता है और ख़ास तौर पर ऐसे हमलों पर रोक लगाता है जो नागरिक और सैन्य ठिकानों के बीच भेद नहीं कर सकते। शहरों पर अंधाधुंध दाग़े गए बिना दिशा-नियंत्रण वाले रॉकेट और क्लस्टर बम—दोनों—दूसरी श्रेणी में आते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय निषेध सार्वभौमिक रूप से लागू होता है, चाहे इस तरह के हमले कोई भी करे।
समस्या का एक हिस्सा अधिकार-क्षेत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति से जुड़ा है, क्योंकि इन हमलों के लिए ज़िम्मेदार कई गुट उन अदालतों की पहुँच से बाहर काम करते हैं जो अन्यथा उन पर मुक़दमा चला सकती थीं। उनका नेतृत्व ऐसे इलाक़ों में रहता है जहाँ गिरफ़्तारी की संभावना नहीं होती, और जो देश उन्हें शरण देते या समर्थन करते हैं, उनके पास प्रवर्तन में सहयोग करने की बहुत कम वजह होती है। अंतरराष्ट्रीय तंत्र मौजूद हैं, लेकिन उन्हें लागू कराने के लिए वे देशों की कार्रवाई पर निर्भर हैं, और उस सहयोग के बिना उल्लंघन से मुक़दमे तक का रास्ता अदालत तक पहुँचने से बहुत पहले ही बिखर जाता है।
स्वतंत्र संगठनों ने भी यही कहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) ने निष्कर्ष निकाला है कि इसराइल पर हाल के मिसाइल हमले, जिनमें क्लस्टर गोला-बारूद वाले हमले भी शामिल हैं, अंधाधुंध थे और युद्ध अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं। रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति (International Committee of the Red Cross) ने चेतावनी दी है कि क्लस्टर गोला-बारूद नागरिकों को हमले के दौरान भी और उसके लंबे समय बाद भी ख़तरे में डालता है, जब न फटे उप-गोले ज़मीन पर बिखरे रह जाते हैं। ये क़ानून के स्थापित सिद्धांत हैं।
जिसे पहचानना कहीं कठिन है, वह है इन क़ानूनों को लागू करने का कोई निरंतर प्रयास। मिसाइलें गिरती हैं, सायरन बजते हैं, कोई मिलिशिया खुलेआम ज़िम्मेदारी लेता है, और फिर ज़रूरी प्रवर्तन तंत्र हवा हो जाता है। इसराइली आबादी वाले इलाक़ों पर हुए इन हमलों से जुड़ी गिरफ़्तारियों, अभियोगों या मुक़दमों की दिशा में बहुत कम प्रयास होते हैं।
यह खाई इसलिए भी उभरकर दिखती है क्योंकि मूल तथ्य छिपे हुए नहीं हैं। हिज़्बुल्लाह के बयान हमलों को चल रही संघर्ष परिस्थितियों से जोड़ते हैं, हूती अधिकारी अपने अभियानों का सार्वजनिक रूप से वर्णन करते हैं, और हमास लंबे समय से इसराइली शहरों पर अपने रॉकेट हमलों का श्रेय लेता रहा है। कई मामलों में ज़िम्मेदारी तय करने के लिए किसी जटिल जाँच की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि हमलावर न सिर्फ़ ख़ुद अपनी पहचान बताते हैं बल्कि इन हमलों का श्रेय भी लेते हैं।
क़ानूनी तंत्र मौजूद हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून जवाबदेही का प्रावधान करता है और कुछ शर्तों के तहत अदालतों को अधिकार-क्षेत्र प्राप्त है। प्रतिबंधों से जुड़े नियम व्यक्तियों और संगठनों—दोनों—को निशाना बना सकते हैं। समस्या यह है कि जब हमलों के शिकार इसराइली होते हैं, तो इन उपकरणों को अमल में नहीं लाया जाता।
जब अस्पतालों और शहरों पर हुए हमलों का नतीजा मुक़दमे के रूप में नहीं निकलता, तो क़ानून अपना असर खोने लगता है। वह कूटनीति और रिपोर्टिंग की भाषा का हिस्सा तो बना रहता है, लेकिन रोकता नहीं। इसलिए मुद्दा क़ानून की अंतर्वस्तु का नहीं, बल्कि उसके निरंतर अनुप्रयोग का है। गंभीर प्रतिक्रिया के लिए नए नियमों की ज़रूरत नहीं है, बल्कि मौजूदा नियमों का समान रूप से लागू होना ज़रूरी है। नीति-निर्माता और क़ानूनी संस्थाएँ घटनाओं की पहचान कर सकती हैं, ज़िम्मेदारी तय कर सकती हैं और जहाँ अधिकार-क्षेत्र इजाज़त देता है वहाँ कार्रवाई कर सकती हैं, जिसमें प्रतिबंध और गिरफ़्तारियाँ शामिल हैं।
ख़ास तौर पर इसराइल के मामले में, नागरिकों को निशाना बनाने वालों के ख़िलाफ़ युद्ध के क़ानूनों को लागू करने में बहुत कम दिलचस्पी दिखती है। जब तक यह नहीं बदलता, क़ानून और उसके अमल के बीच की खाई असाधारण रूप से चौड़ी बनी रहेगी।
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